मूर्खो के सभा में आया एक संत महा गंभीर
बोला , संत वाणी
मूर्खो को याद आ गयी उनकी नानी
बोले कौन हो तुम अभिमानी
हम इतने दिनों से
जी रहे अंधेरो में
तुमने क्यों सूरज उगाने की ठानी
क्या तुम अंधे हो वो संत अभिमानी
संत बोला ,
देखो तो जला के दीपक
कैसे प्रकाश भर जायेगा
एक मुर्ख उठ के बोला
रहे दे बाबा मेरा झोपड़ा जल जायेगा
संत बोले कही दिए से आग लग जाता है
मुर्ख बोले , नहीं
दिए की बाती से, पिघलने लगता है आसमान
और फिर बरसने लगते है बादल
और डूब जाता है
तुम्हारा ज्ञान ||
संत अब सदमे में है
उन्हें अब इलाज की जरुरत है ||
सभी मुर्ख उनका इलाज कर रहे
संत के मन में चोट लगी है
मुर्ख उन्हें झंडू बाम लगा रहे है ||
प्रिया मिश्रा :)
बोला , संत वाणी
मूर्खो को याद आ गयी उनकी नानी
बोले कौन हो तुम अभिमानी
हम इतने दिनों से
जी रहे अंधेरो में
तुमने क्यों सूरज उगाने की ठानी
क्या तुम अंधे हो वो संत अभिमानी
संत बोला ,
देखो तो जला के दीपक
कैसे प्रकाश भर जायेगा
एक मुर्ख उठ के बोला
रहे दे बाबा मेरा झोपड़ा जल जायेगा
संत बोले कही दिए से आग लग जाता है
मुर्ख बोले , नहीं
दिए की बाती से, पिघलने लगता है आसमान
और फिर बरसने लगते है बादल
और डूब जाता है
तुम्हारा ज्ञान ||
संत अब सदमे में है
उन्हें अब इलाज की जरुरत है ||
सभी मुर्ख उनका इलाज कर रहे
संत के मन में चोट लगी है
मुर्ख उन्हें झंडू बाम लगा रहे है ||
प्रिया मिश्रा :)
Wah bahut khub
ReplyDeletethank you :)
ReplyDelete