सोना को सोने की तरह चमक पाने के लिए
कितने आग में जलना होता है
ये नियति है
या निर्ममता है
ये आत्मदाह है
या हत्या है

प्रिया मिश्रा :)
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एक आदमी रोते - रोते
एक दिन इतना थक जाता है
वो उन्ही आँसुओं की सीढ़ी बना के
एक दिन सबको छोड़ कर
चला जाता है

प्रिया मिश्रा :)
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 मैंने असत्य का बिरोध किया था
अब मंजिल नई थी
लेकिन रास्ता खुद बनाना था
और कुल्हाड़ी भी खुद ही लानी थी
कोइ मार्ग नहीं देता
जब आप सुमार्ग पर होते है

प्रिया मिश्रा :)
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मेरी कवितायेँ मेरा मूल रूप है
अभी तक इनमे कोइ ,
मिलावट नहीं
दुनियादारी की ||

प्रिया मिश्रा :)
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 एक कवि  का हृदय  जितनी बार धड़कता
उतनी बार नई कविताएँ जन्म लेती है ||

प्रिया मिश्रा :)
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  तुम्हे इन्तजार करने की भी मेरी एक सिमा थी
अब वो सिमा पार हो गयी
आखिर कब तक इन्तजार करू
तुमने वादा दिया ,
तुम भूल गए
मैं तुम्हारे वादे पर अब कैसे बिश्वाश करूँ
आखिर कब तक इन्तजार करूँ
 अब तो बस इतना कहना है
तुमसे जो सबक मिली उसे जीवन
भर याद  रखना है
कोइ वादा
वादा नहीं होता
अब मुस्कुरा के हर वादे का तिरस्कार करते रहना है
एक निर्मम हत्या के बाद और क्या स्वीकार होगा
आखिर मरे हुए एक व्यक्ति को किसका   इन्तजार होगा
अब तो उसे कफ़न में ढलना होगा
तुम्हे तुम्हारे वादे से अब  मैं मुक्त करती हूँ
चलो अब खुद के जीवन से तुम्हे मुक्ति देती हूँ
अब तुम्हारे जीवन में मेरा स्थान रिक्त रहेगा
अब इंतजार का दिया कभी ना जलेगा ||

प्रिया मिश्रा :)
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मैं स्त्री थी
मैं बीज थी
मैं धरती में जितना दबती गयी
उतना ही सुन्दर मेरा बिस्तार हुआ ||
पुरुष आकाश था
उसने ढक लिया धरती को
जब भी उसे स्वीकार हुआ
कही न कही
मेरा बीज बनना जितना जरुरी था
धरती का ढकना भी उतना ही जरुरी था ||
ना मैं बीज रूपी स्त्री
तुच्छ थी
ना वो आकाश रूपी पुरुष तुच्छ था
बस अपनी - अपनी
सोच का फर्क था
जैसे सोच एक हुए
धरती आकाश एक हो गए
और पृथ्बी का अवतार हुआ ||

प्रिया मिश्रा :)
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एक वृक्ष के को वृक्ष बनने के लिए
हवा , पानी , धुप की उतनी ही अहम् भूमिका है
जितनी की बीज की
सब मिल के पृथ्वी , समय और अंतरिक्ष बनो

और ब्रह्मांड का निर्माड़  करो ||
प्रिया मिश्रा :)

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पुरुष सवाल है तो
स्त्री ज़वाब है
ये अनोखा मेल पृथ्वी का
सुन्दर है
बेमिशाल है
इसे बिभक्त न किया जाये तो अच्छा है
जवाब की सुंदरता उतनी ही महत्वपूर्ण है
जितना की सवाल का  कठिन  होना ||
 प्रिया मिश्रा :)

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मैं तबसे गूंगी हूँ
जबसे मैंने सत्य बोलना सीखा है ||

प्रिया मिश्रा :)
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 भेद - भाव एक गलत समय में लिया गया एक गलत निर्णय है
जिसका परिणाम हमेसा गलत ही रहा है ||
प्रिया मिश्रा :)
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मेरे निश्छल प्रेम को इस तरह छला  गया
जैसे , करुणा की थाली में छिपा बिष हो |
जिसकी खुसबू मन को भा जाये
और बिष रक्त में उतर कर
उत्तर की प्रतीक्षा भी ना करे
की क्यों ??
प्रेम के प्रतिउतर
में बिष का होना अनिवार्य है ||

प्रिया मिश्रा :)
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ये सम्बन्धो की गाठ बाँधी  मजबूत जाती है
लेकिन ,खींचा -तानी  में धागे सरक जाते है
और गाँठ  खुल जाती है

प्रिया मिश्रा :)
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रेशा - रेशा वादा होता है
जो समय के साथ टूट जाता है
और सम्बन्ध फिर से बिखर जाते है ||
प्रिया मिश्रा :)
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मैं शरद पूर्णिमा की तरह थी
वो ग्रीष्म की निर्जला एकादशी ||

मैं शिव - शिवा की भक्त थी
वो बिष्णु  का अवतार ||

मैं जाड़ों की धुप में खिलती गेंदे का फूल
वो ग्रीष्म ऋतू में खिलने वाला मधुमालती ||

हमारा तो मिलने भर का
औपचारिकता भी ना रहा ||

प्रिया मिश्रा :)
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 मैं रो- रो के कविता लिखती हूँ
शब्द बहता जाता है
कागज़ कोरा सा दीखता है
स्याही पानी हो जाता है

प्रिया मिश्रा :)




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