मैं तुझे भूल के भी नहीं भूल  पाता हूँ
ऐसा क्या हैं तुझमे
कोइ नशा
या कोइ नई दिशा

प्रिया मिश्रा :)

मेरी कविताओ में
सारा संसार बस्ता है
बस मैं नहीं बस्ती

प्रिया मिश्रा :)


नए लिबाश से पुराने खयालात नहीं बदलते
किस्से आज भी वही है
जो कल हुआ करते थे
बस शक़्ल बदल गयी है
कहानी आज भी वही है ||

प्रिया मिश्रा

एक आदमी  एक वक़्त में बहोत ख़ास
और एक वक़्त में बहोत बकवाश नहीं होता है
वक़्त बदल जाता है
आदमी अब भी वही है
वक़्त बदल गया है ,
और वक़्त  के साथ नजर बदला है
नजरिया भी
आदमी अब भी वही है ||

प्रिया मिश्रा :)

बड़ा कठिन प्रश्न है
कुसूर क्या था ??
जवाब सन्नटा खा गयी
अब वो भी पूछती है
क्या पूछा था ??
और गूँजता रहता है
सवाल अब भी
कुसूर क्या था ??

प्रिया मिश्रा :)

दायरे में रहने वाले लोग सीमाओ का
जायजा लेते रह जाते है
जो सिमा से बहार की सोचते है
वो नई परिभासा लिखते है
एक नई सिमा बनाते है
जिसे कोइ लाँघ नहीं पता
वर्षो तक
कई वर्षो तक ||

प्रिया मिश्रा

ये भावनावो का खेल निराला है
कभी वहाँ मत जाना जहाँ भावनाये बस्ती हो
ये समुन्द्र की लहरे है
निगल जाएगी
कोइ आवाज नहीं आएगी
चीखे दब जाएँगी
और समुन्द्र शांत हो जायेगा ||

प्रिया मिश्रा :)

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