सोचती थी मैं

सोचती थी मैं भी कुछ ऐसा
मिले कोइ पानी जैसा
कहूं  उस से सबकुछ अपना
घुल जाये उसमे चीनी जैसा ||

रोज - रोज मैं मंदिर जाती
कहती भगवन दे दे एक साथी
भगवान् ने सुन ली मेरी
मिली  सच्ची सहपाठी
वो पानी सी सीतल
मैं चीनी सी मीठी
बातें हमारी घुल जाती
ना वो कुछ कहती
न मैं कुछ कहती
मैं दिया और वो बाती ||

बिस्वाश की डोर है दोस्ती
ना तोड़ो  चटकाए
जो टूटे ना गाँठ बने
आदमी ही मर जाये ||

दिल टूटे तो आस टूटे
आस टूटते तो बिश्वाश
बिश्वाश टूटे तो कुछ ना बचे
सब दरिया में जाये ||

दरिया - दरिया बहता वो
समंदर में मिल जाये
बून्द - बून्द मीठा सा जल
खारा होता जाये ||

बिश्वाश की नीव मत तोड़िये
चाहे तोड़िये टाँग
हड्डिया फिर भी जुट जाएँगी
बिस्वाश है फूल सामान ||

जो टूटे तो सुख ही जाये
फिर ना खिले
चाहे जितना भी रखो उसका ध्यान ||

प्रिया मिश्रा :)

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