हमारी भावना और मन की प्रगति की यात्रा ||

कहा जाता है जैसे भावना हो साईं उसी रूप में दीखते है || अर्थात मन में जहर हो तो जहर दीखता है और अमृत हो तो अमृत दीखता है ||
हाथ में अगर आग रखोगे दुसरो को जलाने को तो वो आग सबसे पहले आपके हाथो को जलायेगी ||
मन की भावना भी कुछ ऐसी ही होती है ||
अगर आपकी मन की भावना सुद्ध  नहीं है || तो यकीं मानिये प्रगति आपके लिए नहीं है ||
एक पल के लिए जरूर लग जाये की हां मैं प्रगति पे हूँ मेरे साथ सब कुछ अच्छा हो रहा है || मैं किसी का बुरा भी सोचूँ तब भी मेरे साथ अच्छा ही होता है || तो ये आपका भ्रम है , क्युकी दिया बुझने से पहले बहोत तेज लौ के साथ जलता है|  और फिर बुझ जाता है हमेसा के लिए || ये भ्रम की भावना प्रगति में बाधक होती है ||
तो भावना को हमेसा सुद्ध रखिये और अपने लक्ष्य में रखिये || थक गए हैं तो दो कदम पीछे लेले ||
लेकिन दुसरो की बुराई ना करे | खुद की कमिया देखे या कहे की खुद को और बेहतर कैसे बनाये ये देखे | अपनी भावना में प्रेम लाये | अच्छे बिचार लाये  | प्रगतिशील विचार लाये  तो जीवन सुखमय होगा ||

एक किसान था वो रोज खेतो में जाता दिन भर काम करता और शाम को जाते वक़्त खेतो से कहता मैं जनता हूँ
मैं कितना भी मेहनत कर लूँ तू फिर भी मुझे कुछ ना देगी || किसान रोज यही कहता और चला जाता ||
किसान बहोत दुखी रहता और घर में भी सबको कहता रहता मैं ही अकेला आया हूँ सबको करने को कोइ मेरे नहीं है || ये फसल भी नहीं आते ||
सभी किसान से बहोत दुखी थे || एक दिन उसका छोटा बेटा  आया और किसान  से बोला  बापू तुम रहने दो आज से खेतो पे मैं जाऊंगा |  किसान ने कुछ देर उसकी और देखा और हाँ कह दिया |
किसान भी अब खेतो से और जिम्मेदारियों  से थक चूका था ||
किसान का बेटा  खेतो पे काम करने चला गया || और वहाँ  जाके  वो बड़े प्यार से  खेतो की पुरानी फसलें  हटाने लगा और कहने लगा , माँ तू जीवन दायनी है हम सब ने तेरी कभी कदर नहीं की || तूने हमें कितना कुछ दिया
और हम रोज तुझे ही सुनाते  रहते है | माँ मान जा ना  देख बापू भी अब थक गए है | वो भी तुझे भला बुरा कहते है मुझे पता है | इसलिए मैं तुझसे क्षमा मांगता हूँ || माँ मान जा ना || और खेतो से बाते करते - करते वो पानी डालता
उन्हें प्यार से चूमता उनसे प्यार करता | फिर जाते वक़्त प्रणाम करके लौट जाता || घर आते हुए किसान उस से कहता तू कुछ भी कर वो कुछ ना देगी || किसान का बेटा मुस्कुराया और घर में चला गया ||
धीरे - धीरे समय बीतता गया
और अब फसल की बारी  आई ||| इस बार फ़सल पहले से जायदा थे || किसान का बेटा बहोत खुस हुआ
और खेतो को धन्यवाद देते हुए कहाँ माँ तू जन्मदायनी है || धन्यवाद माँ ||
और फ़सल को बाजार में बेचने चला गया || वहा  जाकर वो अनाज को बड़े प्यार से देखते हुए बोला आज तो दोस्त तू ही बचा सकता है | एक दोस्त - दोस्त के काम ना आएगा तो कौन आयेगा || बड़ी देर बैठा वो आनाज से बातें करता रहा | कुछ वक़्त बाद एक ब्यापारी आया और आनाजो को खरीद के ले गया उसने ब्यापारी और आनाज दोनों को धनयवाद कहा और घर को लौट आया || उसे देखते ही किसान ने कहाँ बस इतना ही मुझे पता था | किसान का बेटा  मुस्कुराया और अपने काम पे चला गया || इस तरह से अब हर बार फसल पहले से जायदा बढ़ने लगी और पैसे भी पहले से जायदा बढ़ने लगे | कभी ना भी बढ़ता तो किसान का बेटा शिकायते नहीं करता बल्कि और प्यार से उन्हें सींचता ||
किसान और किसान के बेटो की भावना ही उनको अलग करती थी और उनके काम को भी और उस काम के परिणाम को भी ||
बूढ़े बाप की अगर लाठिया टूट जाये कमर कमजोर हो जाये || माँ को कम दिखाई दे || कोइ दोस्त आपका कम साथ दे | घर पुराना  हो जाये  तो उसे छोड़ नहीं दिया करते || सबको प्यार दीजिये
खुद को प्यार दीजिये
वक़्त को भी सराहिये
यही वक़्त एक पल आपको आसमान पे भी रखता है |||
और आम के पेड़ अगर फल देना बंद कर दे तो उन्हें बद्दुआ ना दीजिये || उनकी छाया  में बैठ के दूसरे आम के पेड़ के फल खाइये || इस तरह से आपको सबका प्यार मिलेगा और आप सबको प्यार दे पाएंगे | और आपकी ये भावना आपको दिनों - दिन प्रगति की और ले जाएगी ||

जय हिन्द
जय भारत
प्रिया मिश्रा :)

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