मैं लेखक हूँ
मैं प्रकाश हूँ
जो राह दिखाए
जन - जन को
मैं कण - कण में
फैला वो बिश्वाश हूँ ||
मैं लेखक हूँ
मैं प्रकाश हूँ ||
मेरे एक शब्द में हजार किरणे है
मेरे एक किरणों में लाखो दिए सा प्रकाश
जो राह दिखाए मेरी लेखनी
टीके जिसपे मेरा बिश्वाश
वो बिश्वाश बन जाये
कविता , कविता बन जाये
एक एहसास
मैं एक एहसास हूँ
मैं लेखक हूँ
मैं प्रकाश हूँ ||
बड़े नाजुक से है शब्द मेरे
उठाये पर्वत सा
हिर्दय का तूफ़ान
हर तूफ़ान में एक क्रांति है
हर क्रांति में एक कहानी
मैं कहानी बन इतिहास बनाऊ
मैं क्रांति बन परिवर्तन लाऊँ
मैं कहानी हूँ
मैं इतिहास हूँ
मैं क्रांति हूँ
मैं परिवर्तन हूँ
मैं लेखक हूँ
मैं प्रकाश हूँ ||
मेरे पन्नों पर ही शहर बस्ता
मेरे पन्नों पर ही मोटर चलती
मेरे पन्नों में ही गाँव बस्ता
मेरे पन्नों पर ही वो अल्हड़ सी गाँव की मस्ती
मेरे पन्नों पर बस्ता पूरा समाज
मैं शहर हूँ
मैं गाँव हूँ
मैं पूरा समाज
मैं समाज की काया हूँ
मैं लेखक हूँ
मैं प्रकाश हूँ ||
मैं उगाता घास कलम से
मैं जंगल को कागज पे लाता
मेरे कलम से ढलता सूरज शाम का
मेरे कलम से ही वो फिर उग आता
मैं चाँदनी सा जगमगाता
मैं चाँद को खूबसूरत बनाता
है, आसमान भी कागज में मुस्कुराता
मैं एक चित्रकार हूँ
मैं लेखक हूँ
मैं प्रकाश हूँ ||
मैं प्रेम की मिलन
मैं प्रेम की तड़प
मैं प्रेमिका की सुन्दरता का वर्णन
मैं प्रेमी की हिर्दय की भावना
मैं कामदेव सा सुन्दर
मैं कामदेव की वाशना का तीर
मैं विरो के गाथा का वीर
मैं प्रेम
मैं प्रेमिका
मैं मिलन
मैं तड़प
मैं वीर हूँ
मैं तीर हूँ
मैं लेखक हूँ
मैं प्रकाश हूँ
प्रिया मिश्रा :)
मैं प्रकाश हूँ
जो राह दिखाए
जन - जन को
मैं कण - कण में
फैला वो बिश्वाश हूँ ||
मैं लेखक हूँ
मैं प्रकाश हूँ ||
मेरे एक शब्द में हजार किरणे है
मेरे एक किरणों में लाखो दिए सा प्रकाश
जो राह दिखाए मेरी लेखनी
टीके जिसपे मेरा बिश्वाश
वो बिश्वाश बन जाये
कविता , कविता बन जाये
एक एहसास
मैं एक एहसास हूँ
मैं लेखक हूँ
मैं प्रकाश हूँ ||
बड़े नाजुक से है शब्द मेरे
उठाये पर्वत सा
हिर्दय का तूफ़ान
हर तूफ़ान में एक क्रांति है
हर क्रांति में एक कहानी
मैं कहानी बन इतिहास बनाऊ
मैं क्रांति बन परिवर्तन लाऊँ
मैं कहानी हूँ
मैं इतिहास हूँ
मैं क्रांति हूँ
मैं परिवर्तन हूँ
मैं लेखक हूँ
मैं प्रकाश हूँ ||
मेरे पन्नों पर ही शहर बस्ता
मेरे पन्नों पर ही मोटर चलती
मेरे पन्नों में ही गाँव बस्ता
मेरे पन्नों पर ही वो अल्हड़ सी गाँव की मस्ती
मेरे पन्नों पर बस्ता पूरा समाज
मैं शहर हूँ
मैं गाँव हूँ
मैं पूरा समाज
मैं समाज की काया हूँ
मैं लेखक हूँ
मैं प्रकाश हूँ ||
मैं उगाता घास कलम से
मैं जंगल को कागज पे लाता
मेरे कलम से ढलता सूरज शाम का
मेरे कलम से ही वो फिर उग आता
मैं चाँदनी सा जगमगाता
मैं चाँद को खूबसूरत बनाता
है, आसमान भी कागज में मुस्कुराता
मैं एक चित्रकार हूँ
मैं लेखक हूँ
मैं प्रकाश हूँ ||
मैं प्रेम की मिलन
मैं प्रेम की तड़प
मैं प्रेमिका की सुन्दरता का वर्णन
मैं प्रेमी की हिर्दय की भावना
मैं कामदेव सा सुन्दर
मैं कामदेव की वाशना का तीर
मैं विरो के गाथा का वीर
मैं प्रेम
मैं प्रेमिका
मैं मिलन
मैं तड़प
मैं वीर हूँ
मैं तीर हूँ
मैं लेखक हूँ
मैं प्रकाश हूँ
प्रिया मिश्रा :)
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