ठहरी हुई नदी जब उफान पर चलती है
तब बांध काम नहीं आते ||
प्रिया मिश्रा :)
*****************************
*************************************
मुझमे शब्द नहीं बसते
मैं सब्दो में बस्ती हूँ
इसलिए मैं कविता लिखती हूँ ||
प्रिया मिश्रा :)
*********************************
**********************************
कवी सम्मलेन में
लोग कवियोँ को सुनने आते है
समझने नहीं ||
प्रिया मिश्रा :)*********************
************************************
माँ मेरी कहती है जिंदगी ने जितने इम्तहान लिए है , उतनी डिग्रीया दी होती , तो आज मैं बैरिस्टर होती ||
और मैं कहती हूँ माँ से , मम्मी , अच्छा हुआ जो आपको डिग्रियाँ नहीं मिली वरना हम इतनी अच्छी माँ कहा से लाते ||
माँ बड़ी है बैरिस्टर से , और मेरी इस बात से माँ हँस देती है सकुचा के ||
और माँ की इस हसीं को देख के मुझे खुसी मिलती है 'IAS' वाली ||
प्रिया मिश्रा :)
************************************
*************************************************
प्रतीक्षा करना मेरा
मैं उन सारे घावों को चीरते हुए आऊँगी
जो सदियों से जमी पड़ी है
एक उदाशीन पर्वत की तरह
एक धार निकलेगा फिर से
जिसमे शांति होगी ,
और कोलाहल भी होगा
जीत का ,
प्रतीक्षा करना मेरी
मैं उन सारे घावों को चीरते हुए आउंगी ||
प्रिया मिश्रा :)
******************************
**********************************
डूब के तुझमे ये जाना है
की , तुझमे डूबना
तुझे पा लेना है ||
पाने की खुसी होती तो छोड़ देता
जहाँ से मोक्ष प्राप्त हो वो स्थान कोइ कैसे छोड़े
प्रिया मिश्रा :)
*******************************
*******************************
समय के वार पे समय खुद हस्ता है
और खुद रोता है ||
ये समय है
ये ठहरता नहीं बदलता रहता है ||
प्रिया मिश्रा :)
*******************************
****************************************
मैं प्रतिभा की बहोत धनि हूँ
लेकिन चाँदी के बाज़ार में
हीरे की कीमत कौड़ियों की हो जाती है
कभी -कभी ||
प्रिया मिश्रा :)
********************************
***********************************
आज कल ऐसे जौहरी नहीं मिलते
जो सोने की क़ीमत जाने
आज कल पितलो के दाम लगते है
और सोना मुँह ताकता है ||
प्रिया मिश्रा :)
**************************
********************************
कभी - कभी शाम का ढलना अच्छा होता है
रात की चांदनी निहारने के लिए ||
कभी - कभी रात का ढलना अच्छा होता है
सुबह की रोशनी के लिए ||
लेकिन ढलते वक़्त की पीड़ा वक़्त ही जानता है
कितना मुश्किल होता है
रह - रह के बदलना जिंदगी के लिए ||
प्रिया मिश्रा :)
*****************************
************************************
हरेक बात पे चुप रहोगे तो
ये चुप्पी तुम्हे मार देगी
बाकी सब जिन्दा रहेंगे
प्रिया मिश्रा :)
************************
**********************************
प्यासी धरती को सिर्फ एक बून्द चाहिए
नदी की ,
ये बड़ा सा खारा समुन्द्र
क्या उगायेगा बीज
और क्या पिलायेगा पानी
जो खुद प्यासा है
पानी का बून्द - बून्द लेके ||
प्रिया मिश्रा :)
****************************
***********************************
ये इश्क मीठे को तीखा
और तीखे को खट्टा बना देता है
ताकि एहसास हो ,
की जिंदगी अभी बाकि है
स्वाद भी है
और रंग भी है
तभी ब्लू बदल के लाल
और
लाल बदल के गुलाबी हो जाता है
ये इश्क इंद्रधनुष सा
सातो रंगो में छा जाता है ||
प्रिया मिश्रा :)
**************************
**********************************
ये दुनिया ने गुलाबी चस्मा पहना है
बाकि प्रेम पहले जैसा ही है ,
सफ़ेद ,
शांत और
सुन्दर
निर्मल
और निष्कपट ||
प्रिया मिश्रा :)
अब घड़ियों की जरुरत नहीं
समय को मापने को
किसी आदमी का आपसे मिलने का तरीका ही
आपके सही समय का पहचान है ||
प्रिया मिश्रा :)
***********************************8
रुकोगे तो थाक की जंग लग जाएगी
चलते रहो ,
पैरो में छाले आ सकते है
लेकिन मजिल जरूर मिल जाएगी ||
प्रिया मिश्रा :)
**************************
मैं एक ऐसी कविता लिखना चाहता हूँ
जो मेरे साथ - साथ , तुम्हारे दिल को भी छू जाए
जिसे लिखूँ मैं
और पढ़ी तुमपे जाये
प्रिया मिश्रा :)
**************************
मैं चुप हूँ तो वक़्त बोलेगा
वो जो बोलेगा
वो सही बोलेगा
प्रिया मिश्रा :)
**************************
**************************************
जिन्हे जीना आ जाये वो कभी नहीं मरते
प्रिया मिश्रा :)
*********************************
छोड़ो पीछा करना
जामने का ,
कुछ ऐसा कदम बढ़ाओ
की , जमाना खुद ताल मिलाने लगे आपसे
आपके कदमो की थाप जगा दे
सोये हुए को भी ,
और मुर्दो में जान डाल दे
आपकी जिंदादिली ||
प्रिया मिश्रा :)
*************************
******************************
वो पुराना किताब आज खोला मैंने
जिसके पन्ने पिले पड़े थे
और जिसमे यादे सतरंगी थी ,
प्रिया मिश्रा
*************************************
***********************************************
चुप रह कर भी मैंने बहोत कुछ बोला है
और बैहरो के कान में आवाज भी गयी है
लेकिन बहरे तो गूंगे निकले
अब बोलेंगे कैसे
जब जुबान में दरार है ||
प्रिया मिश्रा :)
*******************************
*************************************
स्वाधीनता का अर्थ है
जुबान पे ताले ना हो
सय्यम हो ||
प्रिया मिश्रा :)
********************************************
*************************************************
मैं पूछना तुमसे कुछ ना चाहती हूँ
बस कहना चाहती हूँ
जब प्राण मेरे निकलेंगे
तुमसे होकर जायेंगे
खुसबू की तरह
वो तुम्हारे मन को छू जायेंगे
तब मिलेगी मुझे मुक्ति
प्रिया मिश्रा :)
****************
वो रह - रह के बैठ जाता है मेरे मन में
पानी में पड़े कंकड़ की तरह
प्रिया मिश्रा :)
*****************************
**************************************
अब थक गए है हम भी
तेरी राह के पत्थर उठाते - उठाते
यूँ ही बेवजह मुस्कुराते - मुस्कुराते
अब जो तुझे मेरी याद आ जाये बता देना
मैं चली आउंगी सपने में
किसी तेरे मन के कोने में छिप
तेरा दर्द बाँट लुंगी
अभी के लिए अलविदा कहती हूँ
चलो अब मैं चलती हूँ ||
प्रिया मिश्रा :)
तब बांध काम नहीं आते ||
प्रिया मिश्रा :)
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मुझमे शब्द नहीं बसते
मैं सब्दो में बस्ती हूँ
इसलिए मैं कविता लिखती हूँ ||
प्रिया मिश्रा :)
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कवी सम्मलेन में
लोग कवियोँ को सुनने आते है
समझने नहीं ||
प्रिया मिश्रा :)*********************
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माँ मेरी कहती है जिंदगी ने जितने इम्तहान लिए है , उतनी डिग्रीया दी होती , तो आज मैं बैरिस्टर होती ||
और मैं कहती हूँ माँ से , मम्मी , अच्छा हुआ जो आपको डिग्रियाँ नहीं मिली वरना हम इतनी अच्छी माँ कहा से लाते ||
माँ बड़ी है बैरिस्टर से , और मेरी इस बात से माँ हँस देती है सकुचा के ||
और माँ की इस हसीं को देख के मुझे खुसी मिलती है 'IAS' वाली ||
प्रिया मिश्रा :)
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प्रतीक्षा करना मेरा
मैं उन सारे घावों को चीरते हुए आऊँगी
जो सदियों से जमी पड़ी है
एक उदाशीन पर्वत की तरह
एक धार निकलेगा फिर से
जिसमे शांति होगी ,
और कोलाहल भी होगा
जीत का ,
प्रतीक्षा करना मेरी
मैं उन सारे घावों को चीरते हुए आउंगी ||
प्रिया मिश्रा :)
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डूब के तुझमे ये जाना है
की , तुझमे डूबना
तुझे पा लेना है ||
पाने की खुसी होती तो छोड़ देता
जहाँ से मोक्ष प्राप्त हो वो स्थान कोइ कैसे छोड़े
प्रिया मिश्रा :)
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समय के वार पे समय खुद हस्ता है
और खुद रोता है ||
ये समय है
ये ठहरता नहीं बदलता रहता है ||
प्रिया मिश्रा :)
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मैं प्रतिभा की बहोत धनि हूँ
लेकिन चाँदी के बाज़ार में
हीरे की कीमत कौड़ियों की हो जाती है
कभी -कभी ||
प्रिया मिश्रा :)
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आज कल ऐसे जौहरी नहीं मिलते
जो सोने की क़ीमत जाने
आज कल पितलो के दाम लगते है
और सोना मुँह ताकता है ||
प्रिया मिश्रा :)
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कभी - कभी शाम का ढलना अच्छा होता है
रात की चांदनी निहारने के लिए ||
कभी - कभी रात का ढलना अच्छा होता है
सुबह की रोशनी के लिए ||
लेकिन ढलते वक़्त की पीड़ा वक़्त ही जानता है
कितना मुश्किल होता है
रह - रह के बदलना जिंदगी के लिए ||
प्रिया मिश्रा :)
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हरेक बात पे चुप रहोगे तो
ये चुप्पी तुम्हे मार देगी
बाकी सब जिन्दा रहेंगे
प्रिया मिश्रा :)
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प्यासी धरती को सिर्फ एक बून्द चाहिए
नदी की ,
ये बड़ा सा खारा समुन्द्र
क्या उगायेगा बीज
और क्या पिलायेगा पानी
जो खुद प्यासा है
पानी का बून्द - बून्द लेके ||
प्रिया मिश्रा :)
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ये इश्क मीठे को तीखा
और तीखे को खट्टा बना देता है
ताकि एहसास हो ,
की जिंदगी अभी बाकि है
स्वाद भी है
और रंग भी है
तभी ब्लू बदल के लाल
और
लाल बदल के गुलाबी हो जाता है
ये इश्क इंद्रधनुष सा
सातो रंगो में छा जाता है ||
प्रिया मिश्रा :)
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ये दुनिया ने गुलाबी चस्मा पहना है
बाकि प्रेम पहले जैसा ही है ,
सफ़ेद ,
शांत और
सुन्दर
निर्मल
और निष्कपट ||
प्रिया मिश्रा :)
अब घड़ियों की जरुरत नहीं
समय को मापने को
किसी आदमी का आपसे मिलने का तरीका ही
आपके सही समय का पहचान है ||
प्रिया मिश्रा :)
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रुकोगे तो थाक की जंग लग जाएगी
चलते रहो ,
पैरो में छाले आ सकते है
लेकिन मजिल जरूर मिल जाएगी ||
प्रिया मिश्रा :)
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मैं एक ऐसी कविता लिखना चाहता हूँ
जो मेरे साथ - साथ , तुम्हारे दिल को भी छू जाए
जिसे लिखूँ मैं
और पढ़ी तुमपे जाये
प्रिया मिश्रा :)
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मैं चुप हूँ तो वक़्त बोलेगा
वो जो बोलेगा
वो सही बोलेगा
प्रिया मिश्रा :)
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जिन्हे जीना आ जाये वो कभी नहीं मरते
प्रिया मिश्रा :)
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छोड़ो पीछा करना
जामने का ,
कुछ ऐसा कदम बढ़ाओ
की , जमाना खुद ताल मिलाने लगे आपसे
आपके कदमो की थाप जगा दे
सोये हुए को भी ,
और मुर्दो में जान डाल दे
आपकी जिंदादिली ||
प्रिया मिश्रा :)
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वो पुराना किताब आज खोला मैंने
जिसके पन्ने पिले पड़े थे
और जिसमे यादे सतरंगी थी ,
प्रिया मिश्रा
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चुप रह कर भी मैंने बहोत कुछ बोला है
और बैहरो के कान में आवाज भी गयी है
लेकिन बहरे तो गूंगे निकले
अब बोलेंगे कैसे
जब जुबान में दरार है ||
प्रिया मिश्रा :)
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स्वाधीनता का अर्थ है
जुबान पे ताले ना हो
सय्यम हो ||
प्रिया मिश्रा :)
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मैं पूछना तुमसे कुछ ना चाहती हूँ
बस कहना चाहती हूँ
जब प्राण मेरे निकलेंगे
तुमसे होकर जायेंगे
खुसबू की तरह
वो तुम्हारे मन को छू जायेंगे
तब मिलेगी मुझे मुक्ति
प्रिया मिश्रा :)
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वो रह - रह के बैठ जाता है मेरे मन में
पानी में पड़े कंकड़ की तरह
प्रिया मिश्रा :)
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अब थक गए है हम भी
तेरी राह के पत्थर उठाते - उठाते
यूँ ही बेवजह मुस्कुराते - मुस्कुराते
अब जो तुझे मेरी याद आ जाये बता देना
मैं चली आउंगी सपने में
किसी तेरे मन के कोने में छिप
तेरा दर्द बाँट लुंगी
अभी के लिए अलविदा कहती हूँ
चलो अब मैं चलती हूँ ||
प्रिया मिश्रा :)
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