सुनो
मिलो हमसे तुम वही पूरानी सखा बनकर
की नया चेहरा भाता नहीं है ||
कल जो मिले थे हम कागज की नाँव में
वो सपनो की गाँव में ,
जैसे कल तुम मुझे भले लगे थे
वैसे मिलो
ये नया चेहरा मुझे भाता नहीं है ||
प्रिया मिश्रा :)
ये बिखरता हुआ सा मैं भीड़ में
कही खो ना जाऊँ
सुलझता हुआ सा ठीक हूँ
अकेले में, मैं ||
प्रिया मिश्रा :)
ये बड़ा अनोखा चित्रण किया है
बिधाता ने प्रकीर्ति और स्त्री का
एक रोती है तो बारिश होती
एक रोती हैं तो आँख में कचड़ा गया होता है
और आँचल घर के कामो से भींगा रहता है ||
अद्भुत है ना चित्रण ||
इस से भी गहरा चित्रण है
पुरुष का ये रोते नहीं
हिर्दय में शून्यता लिए बैठे रहते है
ये कहते नहीं इनकी आँखे कहती है
आज बरसने को जी चाहता है
माँ का आँचल ढूंढ के ला दो ||
प्रिया मिश्रा :)
मैं सिर्फ मैं हूँ
यही मेरी बिशेषता है ||
मैं अलग हूँ सबसे
ये नहीं कह सकती
लेकिन कुछ अलग करना चाहती हूँ
ये बिशेषता मुझे औरो से अलग करती है ||
ये बिशेष गुण क्या होता हैं
मैं नहीं जानती
लेकिन मानती हूँ
मैं लिख सकती हूँ
कुछ बिशेष
कुछ नया
जो बनाये मुझे बिशेस
बाकि सब तो
औरो जैसा ही है
बस मेरे शब्द अलग है
और मेरी कविता बिशेष है
यहीं , मेरी बिशेषता है ||
प्रिया मिश्रा :)
ऐसे सताते क्यों हो
कोइ बात हो दिल में तो कह दो
यूँ रुठ कर बात बढ़ाते क्यों हो
ऐसे सताते क्यों हो ||
जानती हूँ बड़े स्वाभिमानी हो
हिर्दय की पीड़ा कहोगे नहीं
लेकिन साँझा तो कर सकते हो
अपनों के साथ
मेरे साथ
यूँ ग़ुम - शुम रहके
रुलाते क्यों हो
ऐसे सताते क्यों हो ||
ये तुम्हारी आँखों की सिसकिया
जान खा जाएँगी मेरी
जानते तो हो पढ़ लेती हूँ मैं ,
आँखे तुम्हारी
फिर मुझसे चेहरा छुपाते क्यों हो
ऐसे सताते क्यों हो ||
प्रिया मिश्रा
जब मुझे लिखने को जी नहीं चाहता
मैं उसकी राह ताकता हूँ
उसकी चुडिया जब खनकती है
मेरे कविता में प्राण फ़ूट पड़ते है
वो चूड़ियों पे अपने सारी कस्मे तोड़ देती है
और मैं उसके एक मुस्कान पे अपने सारे वादे भूल जाता हूँ
ये धर्म - वेद की बात भी तभी तक
जब तक वो सामने ना थी
अब तो पापी हो गया हूँ
वो गंगा हैं
और मैं गंगा में घुल जाता हूँ |
उसकी चूड़ियों की खनखन में
में , मैं अपना धर्म भी भूल जाता हूँ ||
वो मेरी बनारस की गली
और मैं नया - नया प्रवासी
वो सामने आ जाये
मैं प्रवाश भूल जाता हूँ
उसकी चूड़ियों के खनखन में
मैं अपना धर्म भूल जाता हूँ ||
प्रिया मिश्रा
ये प्रेम से साक्षात्कार भी
प्रेम है ,
अनुभव की बात है
गहरा है
गंगा जैसा निर्मल है
कशी जैसा पवित्र है
ये प्रेम से साक्षात्कार भी
प्रेम है
प्रिया मिश्रा :)
मिलो हमसे तुम वही पूरानी सखा बनकर
की नया चेहरा भाता नहीं है ||
कल जो मिले थे हम कागज की नाँव में
वो सपनो की गाँव में ,
जैसे कल तुम मुझे भले लगे थे
वैसे मिलो
ये नया चेहरा मुझे भाता नहीं है ||
प्रिया मिश्रा :)
ये बिखरता हुआ सा मैं भीड़ में
कही खो ना जाऊँ
सुलझता हुआ सा ठीक हूँ
अकेले में, मैं ||
प्रिया मिश्रा :)
ये बड़ा अनोखा चित्रण किया है
बिधाता ने प्रकीर्ति और स्त्री का
एक रोती है तो बारिश होती
एक रोती हैं तो आँख में कचड़ा गया होता है
और आँचल घर के कामो से भींगा रहता है ||
अद्भुत है ना चित्रण ||
इस से भी गहरा चित्रण है
पुरुष का ये रोते नहीं
हिर्दय में शून्यता लिए बैठे रहते है
ये कहते नहीं इनकी आँखे कहती है
आज बरसने को जी चाहता है
माँ का आँचल ढूंढ के ला दो ||
प्रिया मिश्रा :)
मैं सिर्फ मैं हूँ
यही मेरी बिशेषता है ||
मैं अलग हूँ सबसे
ये नहीं कह सकती
लेकिन कुछ अलग करना चाहती हूँ
ये बिशेषता मुझे औरो से अलग करती है ||
ये बिशेष गुण क्या होता हैं
मैं नहीं जानती
लेकिन मानती हूँ
मैं लिख सकती हूँ
कुछ बिशेष
कुछ नया
जो बनाये मुझे बिशेस
बाकि सब तो
औरो जैसा ही है
बस मेरे शब्द अलग है
और मेरी कविता बिशेष है
यहीं , मेरी बिशेषता है ||
प्रिया मिश्रा :)
ऐसे सताते क्यों हो
कोइ बात हो दिल में तो कह दो
यूँ रुठ कर बात बढ़ाते क्यों हो
ऐसे सताते क्यों हो ||
जानती हूँ बड़े स्वाभिमानी हो
हिर्दय की पीड़ा कहोगे नहीं
लेकिन साँझा तो कर सकते हो
अपनों के साथ
मेरे साथ
यूँ ग़ुम - शुम रहके
रुलाते क्यों हो
ऐसे सताते क्यों हो ||
ये तुम्हारी आँखों की सिसकिया
जान खा जाएँगी मेरी
जानते तो हो पढ़ लेती हूँ मैं ,
आँखे तुम्हारी
फिर मुझसे चेहरा छुपाते क्यों हो
ऐसे सताते क्यों हो ||
प्रिया मिश्रा
जब मुझे लिखने को जी नहीं चाहता
मैं उसकी राह ताकता हूँ
उसकी चुडिया जब खनकती है
मेरे कविता में प्राण फ़ूट पड़ते है
वो चूड़ियों पे अपने सारी कस्मे तोड़ देती है
और मैं उसके एक मुस्कान पे अपने सारे वादे भूल जाता हूँ
ये धर्म - वेद की बात भी तभी तक
जब तक वो सामने ना थी
अब तो पापी हो गया हूँ
वो गंगा हैं
और मैं गंगा में घुल जाता हूँ |
उसकी चूड़ियों की खनखन में
में , मैं अपना धर्म भी भूल जाता हूँ ||
वो मेरी बनारस की गली
और मैं नया - नया प्रवासी
वो सामने आ जाये
मैं प्रवाश भूल जाता हूँ
उसकी चूड़ियों के खनखन में
मैं अपना धर्म भूल जाता हूँ ||
प्रिया मिश्रा
ये प्रेम से साक्षात्कार भी
प्रेम है ,
अनुभव की बात है
गहरा है
गंगा जैसा निर्मल है
कशी जैसा पवित्र है
ये प्रेम से साक्षात्कार भी
प्रेम है
प्रिया मिश्रा :)
Good
ReplyDeletethank you :)
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