"उस पार रहा"
मैं प्रतीक्षा में हूँ
उस नीर के
जो जलते कदमो को शीतल कर जायेगा
जो सूखा - सूखा सा पेड़ है वो ,
हरा - भरा हो जायेगा
मैं प्रतीक्षा में हूँ
उस दीपक के
जो मुझे रौशनी में लाएगा
जो छोड़ गया है
नाता मुझसे
उस परछाई को ले आएगा ||
मैं प्रतीक्षा में हूँ कृष्णा के
जो सुदामा मुझे बनाएंगे
मैं रोऊँगा आसूँ मिलन के
और वो पीते जायेंगे
है कौन कहाँ से आया ये चारो तरफ चीत्कार होगा
तभी आएंगे दौरे कृष्णा और हमारा साक्षत्कार होगा
सोचो जरा घडी वो
किसकी पल्लू कितनी भींगेगी
कौन कितना रोयेगा
है अनुमान कोइ लगा सकता
उस प्रतीक्षा में कितना प्यार होगा ||
लो सफल हुई प्रतीक्षा मेरी
आये कृष्णा गले लगाने को
आसूँ मेरे सुख गए है
होंठ मेरे सिले से पड़े है
रोये कौन और हँसे कौन
अब तो मोहन में जी रम गया है
रौशनी मांगी थी छाया देखने को
ये तो अलौकिक प्रकाश से साक्षात्कार हुआ है
इसमें तो मैं ही गुम हूँ
छाया कहाँ ठहर पायेगी
जो कृष्णा से मिला गले
आत्मा शीतल हो जाएगी
अब सोचता हूँ कितना मीठा है
दोस्ती का वो घड़ा
जिसमे बैठे प्रेम
गागर - गागर छलका जाये
हैं मित्र में इतनी शक्ति
मन में ना समाये
प्रतीक्षा मेरी ख़तम हुई
प्रेम प्यास बढ़ती रही
ये कौन सा मोह डाल दिया मनमोहन
अब भक्ति तुझमे ही बढ़ती रही
अब ना रही कोइ प्रतीक्षा
ना कोइ साक्षत्कार रहा
प्रेम से लगाई प्रीत
ये प्रीत मेरे मन के
इस पार रहा
उस पार रहा ||
प्रिया मिश्रा :)
मैं प्रतीक्षा में हूँ
उस नीर के
जो जलते कदमो को शीतल कर जायेगा
जो सूखा - सूखा सा पेड़ है वो ,
हरा - भरा हो जायेगा
मैं प्रतीक्षा में हूँ
उस दीपक के
जो मुझे रौशनी में लाएगा
जो छोड़ गया है
नाता मुझसे
उस परछाई को ले आएगा ||
मैं प्रतीक्षा में हूँ कृष्णा के
जो सुदामा मुझे बनाएंगे
मैं रोऊँगा आसूँ मिलन के
और वो पीते जायेंगे
है कौन कहाँ से आया ये चारो तरफ चीत्कार होगा
तभी आएंगे दौरे कृष्णा और हमारा साक्षत्कार होगा
सोचो जरा घडी वो
किसकी पल्लू कितनी भींगेगी
कौन कितना रोयेगा
है अनुमान कोइ लगा सकता
उस प्रतीक्षा में कितना प्यार होगा ||
लो सफल हुई प्रतीक्षा मेरी
आये कृष्णा गले लगाने को
आसूँ मेरे सुख गए है
होंठ मेरे सिले से पड़े है
रोये कौन और हँसे कौन
अब तो मोहन में जी रम गया है
रौशनी मांगी थी छाया देखने को
ये तो अलौकिक प्रकाश से साक्षात्कार हुआ है
इसमें तो मैं ही गुम हूँ
छाया कहाँ ठहर पायेगी
जो कृष्णा से मिला गले
आत्मा शीतल हो जाएगी
अब सोचता हूँ कितना मीठा है
दोस्ती का वो घड़ा
जिसमे बैठे प्रेम
गागर - गागर छलका जाये
हैं मित्र में इतनी शक्ति
मन में ना समाये
प्रतीक्षा मेरी ख़तम हुई
प्रेम प्यास बढ़ती रही
ये कौन सा मोह डाल दिया मनमोहन
अब भक्ति तुझमे ही बढ़ती रही
अब ना रही कोइ प्रतीक्षा
ना कोइ साक्षत्कार रहा
प्रेम से लगाई प्रीत
ये प्रीत मेरे मन के
इस पार रहा
उस पार रहा ||
प्रिया मिश्रा :)
Bahut khub
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