"गृहस्थ जीवन "

है गृहस्थ जीवन क्या
समझने को मेरे ललना
आवो कभी घर के अंदर देखो
कैसे होता है
मकान का घरबनाना

यहाँ कोइ बड़ी बेवस्था नहीं
नाही कोइ गड़ना
है छोटी सी कुटिया
उसमे गृहस्वामिनी बनाये रोटी
गृहस्वामी झले उसे पंखा
और पास पड़े पलने में खेले
वो छोटा सा ललना ||

साग - भाजी का काम पति बाँट ले
पत्नी मुस्कुराये तो हँसे  चारो अँगना
वो ललना देखो खेल रहा,
हैं , जो मईया के कँगना ||

छोटी रीत से बनी
 प्रीत की पक्की डोर
सुखी रोटी स्वामी यूँ खाएँ
जैसे घी से है वो सराबोर ||

आज  गृहणी
थकी - थकी सी है
झले  ना जाये उस से पंखा
स्वामी बोले ला पगली
मैं झल  दूँ तेरा पंखा ||

दो - दो रुपये का हिसाब है
कहीं जायदा ना कुछ हो जाये
पर ललना के एक मुस्कान पे
लाखो ही लूट  जाये
ये  है  गृहस्थ जीवन छोटा सा
देखो तो समझ ना आये
पर छोटे से कुटिया
प्रेम का ब्रह्माण्ड समाये ||

जहां स्वामिनी के कदम लड़खड़ाए वहाँ
स्वामी के बाँहें थामे हैं
जहाँ स्वामी के कदम लड़खड़ाए
वहाँ स्वामिनी हैं आँचल ताने
दोनों मिल के बाटते जीवन
आधा - आधा
आधी - आधी रोटी खाये
जीवन हो पूरा सादा
खुसिया हो चांदनी में नहाई
गम जहां भागा - भागा
गृहस्थ जीवन
सुखद मिलन है
प्रभु मिले जैसे
सीता संग
जैसे कृष्णा
संग राधा ||

प्रिया मिश्रा :)


 

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