"वो बुलाती है मगर"

पड़ोसन आई नई - नई
दिल ने मेरे कहा
बेटा , तेरा तो इतवार
सोमवार सब बन गया
मैंने कहा ,
 श्रीमती जी से
अजी  सुनती हो
नए पडोसी आये हैं
 चलो जरा हाल पूछ आये
वो बोली फुदक क्यूँ  रहे तुम इतना
क्यों हम बिना बुलाये जाएँ
हमें लगा लो अब सपना तो टूट गया
मेरा किस्मत फुट गया
तभी आया एक बिचार
बीवी को मनाने को
पडोसी को लुभाने को
हमने रखा दोस्तों का मिलन वार
बीवी को दिलाया पूरा बाजार
बीवी सज - धज दिखाने को
उतावली हो गयी पड़ोसन  बुलाने को ||
पड़ोसन भी आई मुस्कुराती -मुस्कुराती
हाय , दिल मेरा वही बैठ गया
जहाँ उसके कदम हमारे अँगने  में आये थे ||
ये आँगन पे इतना गौर न कीजिएगा  ये तो यूँ  ही कह दिया
पर सच कहुँ  दिल मेरा वही रह गया
जहाँ  - जहाँ वह चली थी
हाय , पड़ोसन मेरी कितनी भली थी ||
तभी आई खाने की बारी
सबने अपनी - अपनी प्लेट संभाली
मैं लगा डोसा - इडली डालने
पड़ोसन लगी और मांगने
हम डालते गए वो मांगती गयी
ख्याल तब आया
दीवाने को ,
जब बीवी ने दो कोनी लगाए
खाना सब ख़तम हो गया
बेइज्जती की कोइ चर्चा ही ना पूछो ,
सरेआम हमारे आँखे चार होने की
पर्चे निकल गए |||
सुबह - सुबह अब बिस्कुट नहीं
हमारी बातें चाय के साथ लोग लेने लगे
 और हमारे पडोसी मिश्रा जी बोले
सुनिए शर्मा जी
यूँ जी ललचाने का नहीं
बुलाती है मगर जाने का नहीं ||

प्रिया मिश्रा :)

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