"तुम रोज न पूछा करो की मेर हाल  कैसा है "

तुम रोज ना पूछा करो की मेरा  हाल कैसा है
क्या बताऊँ ,
कैसा गुजरता है दिन
और रात का हाल कैसा हैं
गुजरती शामो में गुजर जाती है
मेरी उम्म्मीदे
और दोपहर की धुप में जल जाता हैं
आँखों का पानी |
अब तो ना नींद आती है
ना भूक लगती है
एक बेरोजगार की जिंदगी
तानो में गुजरती है
ये तुम्हारा हाल पूछना भी
व्यंग है ,
तो रहने दो हमें अकेले
सहने दो हमें अकेले
कुछ कर नहीं सकते तो
मजे न लिया करो हमारे
हमारे आँसुओ पे  कुछ तो तरस खाओ
मुझे हारा देख मेरा मजाक ना उड़ाओ |

गिरे हुए पंख वापस आ जाते है
सुखी  हुई नदी फिर से हिलोरे मारने लगती है
ईमारत गिर भी गयी हो तो
नींव में जंग नहीं लगती
हौसला बुलंद हो तो
जिंदगी भी नहीं रूकती
मैं चला हूँ तो ,
थक जरूर जाऊँ
हार के छाले कभी ना आएंगे
और हसने वाले ,
कुछ नजरे चुरायेंगे
कुछ पीठ थपथपा के जायेंगे
उनके शब्द तब बदल गए होंगे
नाकारा अब,
लायक हो गया
और मेरे दिमाग में उन्हें देख आएगा
मेरे दिन फिरते ही
कौआ अब गायक हो गया ||

प्रिया मिश्रा :)

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