कई इंद्रधनुष बहके हुए से
नाच रहे हैं तुम्हारे चेहरे पर
सुबह की धूप की एक किरण
खिड़की को बुद्धू बना आ गयी है बिस्तर तक
मैं वही बैठी निहार रही थी तुम्हे
तुम्हारी आँखो में जो चमक कल रात था
वो चमक अब सूरज ले जाग चूका हैं
और तेरे ही प्रकाश से तुझे जगा रहा हैं
और तेरे बातो में जो धुन थी वो
चिड़ियों ने चुराया हैं
हवाएं भी तुझसे जरा मीठापन ले गयी हैं
और झल रही हैं पंखा
तुझसे तेरा उधार का मीठापन लेके
तेरे कपोलो से गुजरती हुई धुप
जाने कितने रंगो में बट जाती हैं
फिर इंद्रधनुष का रंग बना मेरी चुंदरी से लग जाती हैं


प्रिया मिश्रा :)

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