क़िताब
खुली बेपरवाह किताबों
के पन्ने पलटते हैं
शब्द खामोश होते है ||
बंद किताबो के पन्ने कैद होते है
और शब्द खोये हुए से
खुली शांत किताबों
के पन्नो में ठहराव होता है
शब्द मुस्कुराते है
सब कुछ दिखता है
समझ आता है
वैसे ही जैसे तेरी
आँखों का सूनापन
और सवाल समझ आते है
पढ़ने को जी चाहता है
जैसे कोइ
डिग्री लेनी हो
प्रिया मिश्रा :)
खुली बेपरवाह किताबों
के पन्ने पलटते हैं
शब्द खामोश होते है ||
बंद किताबो के पन्ने कैद होते है
और शब्द खोये हुए से
खुली शांत किताबों
के पन्नो में ठहराव होता है
शब्द मुस्कुराते है
सब कुछ दिखता है
समझ आता है
वैसे ही जैसे तेरी
आँखों का सूनापन
और सवाल समझ आते है
पढ़ने को जी चाहता है
जैसे कोइ
डिग्री लेनी हो
प्रिया मिश्रा :)
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