"उस रात को अगर माँ ने मुझे रोका ना होता "(लघु - कथा )

मैं अकेली सुनी सड़क पे चली जा रही थी |  आज प्राथना कर  रही थी कोइ गाड़ी मुझसे होकर गुजर जाये | मरना चाहती थी | सुनी सड़क पे रोती हुई  गुजर रही थी | कॉल पे कॉल आ रहे थे | लेने का जी ना हो रहा था | सुसाइड करना तय था | इरादा पक्का कर लिया था | किसी के प्यार में पागल थी | और वो पागलपन सर पे सवार था | तभी माँ का कॉल आया | सोचा माँ से आखरी बार बात कर लूँ | माँ का कॉल लिए | माँ मेरी बचपन की तस्वीर देख रही थी | वो मेरी शरारते , मेरी सैतानिया , मेरा भोलपन सब बातें कर के इतनी  खुस थी , जैसे उसे कोइ खजाना मिल गया हैं | मुझे प्यार करती हुई बोली बेटा जल्दी घर आ जा , अब अकेले नहीं रहा जाता | तेरे पापा भी तुझे याद करते हैं |
 कुछ दिनों बाद ससुराल चली जाएगी फिर पराई हो जाएगी | जल्दी आ जा बेटा | ये कहते हुए माँ कि सिसकिया सुरु हो गयी | मैंने  बहोत प्रयाशो के बाद जल्दी आने  वादा दे के उसको चुप कराया |
माँ की एक कॉल ने मुझे जीने का नया मकशद दिया |
जियो हमेसा उनके लिए जो  आपके लिए जीते हैं | उनके लिए नहीं जिनको कदर ही ना हो ||

प्रिया मिश्रा :)

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