आज के समाज में एक घर टूटता हैं
हजार लोग लुटते हैं ||
आनंद का वक़्त होता हैं उनके लिए |
वो उस वक़्त का उपभोग करने से पीछे नहीं हटते |
कोइ परिवार के एक सदस्य को भड़काता हैं
कोइ दूसरे सदस्य के आखे पोछता हैं
पर फिर भी पीठ पीछे हस्ते सब हैं |
पर मैं एक बात बता दूँ
द्रोपती ने पहले ही इन हसने वालो को शार्प दिया हैं
अब मुझे दोहराने की जरुरत नहीं हैं |
काल अपनी गति से चल रहा हैं |
आज पांडव चौदह वर्ष वन भटक रहे तो क्या हुआ |
कौरव सभा तो मौन होनी ही हैं |
आज दिशा बदल कर इधर वक़्त भटका हैं |
कल की होनी तेरी ही हैं |
आज हस , ले भाग ले
पासों का वक़्त हैं
कुछ तो मोल चुकाएंगे ही युधिस्ठिर
अपने चालो का |
पर अंत तो दुर्योधन और सकुनी का भी निश्चित ही हैं ||
गांधारी का विलाप भी उतना ही सत्य हैं
जितना सत्य आज की तेरी क्रीड़ा हैं ||
तो हस ले वो कौरव समाज
क्युकी कल की पीड़ा तो तेरी ही है ||
प्रिया मिश्रा

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog