कई इंद्रधनुष बहके हुए से
नाच रहे हैं तुम्हारे चेहरे पर
सुबह की धूप की एक किरण
खिड़की को बुद्धू बना आ गयी है बिस्तर तक
ताक रहा हैं कौआ काला
गौरैया भी झांक रही
आलस की चादर हटा
मुख पे जरा धुप तो आने दे
देख न कैसे आ गयी हैं
सूर्य की किरणे तेरे बिस्तर तक
घड़ी का घंटा बोल रहा
समय न आना हैं
लौटकर
फिर क्यों न तू आखे खोल रहा
कल रात कुछ सपने आये तो होंगे
उन्हें खुली आखों में जगा
चल उठ लल्ला अब जाग भी जा
देख न चंदा रूठ के भागा
कल रात तो तेरे कमरे में आके
पाँव फैलाये बैठा था
अब तो खुली हुई
धुप हैं ,
हवा भी अब दे रही ताना
सुरु हो गया हैं
अब चिडियो का आना - जाना
अब तो रख दे नींद को ताख पे
चल सपने अब तू भाग भी जा
चल लल्ला अब तू जाग भी जा ||

Comments

Popular posts from this blog