"उसी के दम पे जिन्दा थी मुहब्बत "

मैंने लाख जतन किये
वो समझ ना पाया
उसे प्यारी थी उसकी दुनिया
वो कदर ही ना कर पाया
की ख्वाइशे टूट गयी
और मर गई वो मुहब्बत
जो,
उसी के दम  पे जिन्दा थी मुहब्बत ||

वो दुनिया के भीड़ में खो गया
मैं उसकी आँखों में सिमट गयी
कैद को रिहाई न मिली
मैं जिन्दा ही डूब के रह गयी
वो दुनियादारी देखता रह गया
मैं पूरी दुनिया उसमे देखते रह गयी
वो भूल गया की ,
उसी के दम  पे जिन्दा थी मुहब्बत ||

वो पहले आशकी किया करता था
वो हर पल मुझे अपने दुनिया में तौला करता था
मैं तो खुद की ना रही
वो झूट बोला करता था
गिर गयी वो सारी ख्वाबो की दीवारे
जो कभी फूलो से सजा करती थी
हम एक होते - होते
दूर हो गए
और वो भूलता चला गया की ,
उसी के दम पे थी मुहब्बत ||

प्रिया मिश्रा :)


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