रात का राही अँधेरे में जाने कौन सा
रास्ता तलाशता है , वो भटका है ,
सुनी सड़क
पे अपनी पहचान तलाशता है .
अभी तो इतनी भीर थी ..
सब कहा चले गए ..
वो राह भुला राही भीड़ में ..
अपनों का चेहरा तलाशता है ...
पर कोइ नहीं है , बस एक सनाटा है ,
कुछ धीमी सरसराती हवाएं है ,
पसरी
हुई सी ये बेजान सी सड़क है ..
और वो राही ...
अँधेरे में उसकी परछाई भी नहीं है ...
वो अकेला है ...
हाँ अकेला सा है बिल्कुल अडोल सा..
कल जब सूरज खिलेगा फिर भीड़ होगी ..
अंधेरो में कोइ नहीं होता ...
प्रिया मिश्रा

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