जब बारिश के दिनों में
मिट्टी के खिलौने बना के खेला करती थी
मैं तब बचपन जिया करती थी !!
जब गीली मिट्टी में सने मेरे पाँव
संग -संग बूंदो के चला करते थे
तब मैं रास्ते ढूंढा करती थी !!
काले स्लेट पे
सफ़ेद से अक्षर
कुछ मोटा कुछ पतला
कुछ फुल कुछ गमला
जब मैं यूँ ही लकीरे खींचा करती थी
तब मैं दिल लगा के पढ़ा करती थी !!
यूँ ही सीखाने पर जय करना
नमस्कार करना होता था
तब कहा कुछ अलग था
हर सूरत में पत्थर भगवन हुआ करता था
हर जगह सर झुका देना मासूमियत से
तब मैं हर रोज
इस्वर को
श्रद्धा से नमस्कार किया करती थी !!
अब तो बात -बात पे दिल टूट जाता हैं
हर जगह पत्थर नजर आता हैं
बारिश की बुँदे बरस के सुख जाती हैं
और भीड़ में भी खालीपन नजर आता हैं
ये हैं आज की दुनिया
हम बड़ो की
जहा बचपन तिल-तिल कर के मर जाता हैं !!
प्रिया मिश्रा
मिट्टी के खिलौने बना के खेला करती थी
मैं तब बचपन जिया करती थी !!
जब गीली मिट्टी में सने मेरे पाँव
संग -संग बूंदो के चला करते थे
तब मैं रास्ते ढूंढा करती थी !!
काले स्लेट पे
सफ़ेद से अक्षर
कुछ मोटा कुछ पतला
कुछ फुल कुछ गमला
जब मैं यूँ ही लकीरे खींचा करती थी
तब मैं दिल लगा के पढ़ा करती थी !!
यूँ ही सीखाने पर जय करना
नमस्कार करना होता था
तब कहा कुछ अलग था
हर सूरत में पत्थर भगवन हुआ करता था
हर जगह सर झुका देना मासूमियत से
तब मैं हर रोज
इस्वर को
श्रद्धा से नमस्कार किया करती थी !!
अब तो बात -बात पे दिल टूट जाता हैं
हर जगह पत्थर नजर आता हैं
बारिश की बुँदे बरस के सुख जाती हैं
और भीड़ में भी खालीपन नजर आता हैं
ये हैं आज की दुनिया
हम बड़ो की
जहा बचपन तिल-तिल कर के मर जाता हैं !!
प्रिया मिश्रा
Wow!! Priya Mishra..awesome poem..🤗🤗 keep it up☺😍
ReplyDeleteSuchitra Pandey..😍
thank you g
ReplyDeleteNyc poem di@🤩
ReplyDeletethank you :)
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