"फिर उसने मुड़  कर नहीं देखा "

हम मिले
एक मोड़ पे
मैंने सोचा मोड़ हैं
उसने भी ऐसा ही सोचा होगा
लेकिन हमारे रस्ते अलग ना हो पाए
किस्मत को सायद मेरी हार पसंद थी
उसने मुझे जितने का मौका नहीं दिया
वो रास्ते भर रहा साथ
लेकिन हमसफ़र न बन पाया
हम रह गए इन्जार करते
वो खुद की मजिल तय कर के आया था
मेरे बर्बादी का पूरा सामान ले आया था
जाते - जाते
मेरी मंजिल
मेरा रूह
मेरी छाया तक
चुरा के ले गया
और फिर ,
फिर उसने मुड़ के नहीं देखा ||

प्रिया मिश्रा :)

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