" बचपन की मस्ती "

बचपन की मस्ती का क्या कहना

ख्वाबों का एक झरोखा सा दीखता है
जिसमे यादें बस्ती है ||

वो कागज की कश्ती  भी
बारिश के   समंदर में
शान से चलती हैं ||

हम भी सिंदबाद थे बचपन में
हमारी भी कश्तिया उतरा करती थी
"कागज की कश्ती "
बरसात  के समंदर में अरमानो का
तिजोरी लिए
और हम सिंदबाद
सबसे बड़े सौदागर
लेकिन तब कभी
खुद के सपनो का सौदा न किया
आज करने  लगे है ||

बचपन की मस्तियो में
आमो के बागो से आम
को चुरा के खाना
सबसे बड़ी हमारी उपलब्धियों में से एक है ||

गिलहरियों को फुदकते देखना
चिड़ियों का चहचहाना
निदियो में दौड़ लगाना
बादलों के पीछे भागना
ये सब हमारे खेल हुआ करते थे ||

पाठशाला के
किताबो से
कहानियो को चुराना
हरेक सवाल पे एक और सवाल उठाना
कुछ छाड़िया भी मिली
जो सबक बन के आज काम आती हैं
वो बचपन की मस्ती
अब ख़यालो में ही मुस्कुराती है ||

रात को दादी
की कहानिया
दादा जी की लोरी
और खुले आसमान में सो के ,
तारे  गिनना
चाँद से बाते करना
ये बचपन का चाँद
जाने कहा खो गया
दादा - दादी
विर्धाश्रम के गुलाम हो गए
और बचपन
कही अंधेरो में गुम गया
अब तो शाम आती ही नहीं
बस रात होती हैं
जिसमे शोर बाहर होता
और अंदर सिर्फ सन्नाट बस्ता हैं ||

प्रिया मिश्रा :)



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