मैं ठहरी ओश की बून्द
कहा धरती को अभी देखा हैं
पल में गिरी पत्तो पर
अभी तो फूल पे मुस्कुराया हैं
मैं क्या जानु पत्थर क्या हैं ?
क्या होता हैं माटी ?
इतना कहाँ मुझे वक़्त ही मिलता
कहाँ मैं इतना ठहर पाती ?
जब धुप पड़ेगी मैं सुख जाउंगी
जब पत्ती हिलेगा मैं टूट जाउंगी
मैं कहाँ फूल पर अधिक समय मुस्कुरा पाऊँगी
कोइ झोका तो होगा बेवक़्त का
जो डाली से टकराएगा
फिर मेरा घर कहा होगा
फूल भी बिखर जायेगा ||
प्रिया मिश्रा :)
Nice poem
ReplyDeletethank you G :)
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