स्त्री, पुरुष और समाज ||

हमारे समाज के दो ही अंग हैं | एक स्त्री दूसरा पुरुष |  दोनों ही अपना - अपना स्थान रखते हैं | फिर  ऐसी कौन सी चीज हैं जो इनको बाट  देती हैं | सोच से जायदा कुछ भी नहीं | सोची ही हैं जो समाज को पुरषो का बल जायदा दिखता है वरना  स्त्रियाँ पुरसो के मुकाबले जाएदा काम करती हैं | ये सबको पता हैं | वो घर भी देख लेती हैं | बहार का भी काम देख लेती हैं | बच्चे  भी देख लेती हैं और खुद को भी संभाल लेती हैं | अगर पुरुष समाज का अभिन्न अंग हैं तो स्त्रियों को कम क्यों आका जाता हैं | ये बात मेरी समझ से बाहर  हैं | बहरहाल ,
मैं यहाँ मेरी चर्चा का बिषय  यहाँ "स्त्री" और "पुरुष" नहीं समाज की सोच को आइना दिखाना हैं | वो आईना जिसे हम रोज देखते तो हैं लेकिन खुद के अंदर झाकने की हिम्मत नहीं कर पाते | वरना जो शिव की पूजा करेगा वो शक्ति को नकार नहीं सकता | और जो शक्ति का उपाशक हैं वो शिव को नाकर नहीं सकता है ||
हमारे समाज में इसीलिए दोनों की पूजा का स्थान हैं | अर्थात बराबरी का स्थान | तो कमतर न आके चाहे वो स्त्री हो या पुरुष समाज निर्माड में सबका योगदान बराबर हैं | और अगर जननी न होगी तो जनक क्या करेगा और जनक न होगा तो जननी की करेगी |
इसलिए तो कहा गया जगजननी अर्थात जगतजननी( जनक + जननी )
तो समाज के निर्माड में सहयोग करे और दोनों का आदर करे |  पुरुष अगर बाहर  का काम करता हैं तो स्त्री घर का | और दोनों मिल के गृहस्त जीवन को सँभालते हैं | इसको ऐसे देखा जाये तो पुरुष पैसे कमा के लता हैं | लेकिन वो पैसे खा नहीं सकता | पैसे पर सो नहीं सकता और पैसे से घर नहीं बनता | पैसे से सिर्फ मकान  बनता है | और मकान को घर स्त्री बनाती है | इसलिए कहा गया हैं की स्त्रीया गृहलक्ष्मी होती हैं  और पुरुष पालन करता | तो दोनों का योगदान बराबर होता है | किसी का महत्व कम नहीं | बस नजरिये का फर्क हैं |

प्रिया मिश्रा :)

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