प्राथना
आज प्राथना स्वीकार होने वाली थी |कोइ लौट के आने वाला था | वो जो बरसो पहले छोड़ के गया था |
जिसके पाँव के चिन्ह मिटते चले थे | पर एक आँगन था जो आज भी उसे ढूंढ रहा था |
उसके माँ का आँगन उसकी बेवा का आँगन |
आज एक चमत्कार होने वाला था | उसके आने की खबर हवाओ ने पहले ही दे दी थी | उसके खुसबू से पूरा घर महकने लगा था | जैसे वो दिल में छुपा बैठा था और आज आजाद हुआ हैं |
वो फ़ौजी कई दिनों के लड़ाई के बाद घर आया था | उदाश बर्तन खनकने लगे थे | चूल्हे में खुसबू आ गयी थी |
बच्चे दोबारा अपने पिता को देख पाए | और उसकी माँ को फिर से उस दर्द का एहसास हुआ जो उसके जन्म के समय हुआ था | बेटे से फिर मिलने की पीड़ा प्रसूति के पीड़ा से भी जायदा थी |
और उसकी बेवा सफ़ेद साड़ी में एकदम उदाश दिन की तरह हो गयी थी | उसके नजर भर देख लेने से उसके
सादे सफ़ेद कपड़ो में रंग बसने लगा था | उसके बिखरे बालो से मोगरे की खुसबू आने लगी थी | उसके आँखों में आसूं में काजल थे | और वो जिन्दा लाश की तरह एक टक निहार रही थी उसे |
आज एक प्राथना जीती जगती दीखि थी | किसी के पिता के रूप में | किसी के बेटे के रूप में | किसी के पति के रूप में |
और घर फिर से चहचहाने लगा था |
प्राथना स्वीकार हुई थी
और यादें खूबसूरत होने लगी थी
जब वो कई वर्षो बाद लौटा था एक उम्मीद बनके एक आस बनके ||
प्रिया मिश्रा :)
आज प्राथना स्वीकार होने वाली थी |कोइ लौट के आने वाला था | वो जो बरसो पहले छोड़ के गया था |
जिसके पाँव के चिन्ह मिटते चले थे | पर एक आँगन था जो आज भी उसे ढूंढ रहा था |
उसके माँ का आँगन उसकी बेवा का आँगन |
आज एक चमत्कार होने वाला था | उसके आने की खबर हवाओ ने पहले ही दे दी थी | उसके खुसबू से पूरा घर महकने लगा था | जैसे वो दिल में छुपा बैठा था और आज आजाद हुआ हैं |
वो फ़ौजी कई दिनों के लड़ाई के बाद घर आया था | उदाश बर्तन खनकने लगे थे | चूल्हे में खुसबू आ गयी थी |
बच्चे दोबारा अपने पिता को देख पाए | और उसकी माँ को फिर से उस दर्द का एहसास हुआ जो उसके जन्म के समय हुआ था | बेटे से फिर मिलने की पीड़ा प्रसूति के पीड़ा से भी जायदा थी |
और उसकी बेवा सफ़ेद साड़ी में एकदम उदाश दिन की तरह हो गयी थी | उसके नजर भर देख लेने से उसके
सादे सफ़ेद कपड़ो में रंग बसने लगा था | उसके बिखरे बालो से मोगरे की खुसबू आने लगी थी | उसके आँखों में आसूं में काजल थे | और वो जिन्दा लाश की तरह एक टक निहार रही थी उसे |
आज एक प्राथना जीती जगती दीखि थी | किसी के पिता के रूप में | किसी के बेटे के रूप में | किसी के पति के रूप में |
और घर फिर से चहचहाने लगा था |
प्राथना स्वीकार हुई थी
और यादें खूबसूरत होने लगी थी
जब वो कई वर्षो बाद लौटा था एक उम्मीद बनके एक आस बनके ||
प्रिया मिश्रा :)
Excellent
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