बेहतरीन वक़्त के लिए क्या किया जाये |
कुछ यूँ किया जाये |
उसके कदम से कदम से मिला के चला जाये |
कही तो पहूँच ही जायेंगे |
नदी के किनारे - किनारे जाओ |
तो शहर आ ही जाता हैं |
बसेरा मिले न मिले
एक ठोकर लगती हैं
और फिर से कोइ किनारा मिल ही जाता हैं |
और फिर एक नए शहर की तलाश |
हम बंजारों को और क्या चाहिए ||
प्रिया मिश्रा :)
Nice poem
ReplyDeletethank you g :)
ReplyDelete