उर्मिला किस से कहेगी

आज लक्छ्मण त्यार हैं
भ्रात प्रेम निभाने को

चौदह वर्ष का वनवास हैं
उर्मिला का एक घरी चौदह वर्ष का ||

कब तक वो विरह सहेगी
आखिर उर्मिला किस से कहेगी ||

सीता बहना तू संग तेरे नाथ के |
प्रभु संग तेरा वनवास होगा||

वो वनवास कहाँ होगा |
जब प्रभु का साथ होगा ||

मैं रहूंगी महलो में |
ये महल भी मुझे चुभेगा |
ये चौदह वर्ष का वनवास |
धीरे - धीरे |
अजगर बन कर |
बिष अपना उडेलेगा |
और मैं चुप रहूंगी |
आखिर मैं किस से कहूँगी ||

सुन कर बहना की पीड़ा
माँ सीता भी ह्रदय से बिचलित हैं |
न होगा कोइ पत्राचार
न कोइ आत्मा संग बिहार होगा |
उर्मिला होगी महलो में |
और लक्छ्मण भैया |
वन में |
ये कैसा न्याय होगा |
उर्मिला कैसे सबकुछ सहेगी
आखिर उर्मिला किस से कहेगी |

आत्मा की पीड़ा आत्मा ही जाने
भरे  जल लक्छ्मण
लेते बिदाई |
संगनी संग धर्म न निभाई |
भाई धर्म निभाना हैं |
रघुकुल रीत सदा |
प्रीत  धर्म में |
धर्म ने  विजय पाई हैं |
मेरा प्रीत सत्य हैं |
और मेरा धर्म अटल हैं |
मैं सुन लूंगा तेरी |
वो न कही बातें |
हिर्दय  से तेरे पास रहूँगा |
तू कर लेना मुझसे बातें |
तूम  तुम्हारा  धर्म निभाओ |
चलो अब तिलक लगावो |
उर्मिला मेरी आत्मा हैं
वो संग मेरी परछाई बन चलेगी |
तो हे उर्मिले ये मत सोच
की तू तेरी पीड़ा किस से कहेगी ||

प्रिया मिश्रा :)




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