एक बार फिर वही
फिर वही सोमवार
मैं थकी हुई सी
न सोई न जगी
सारा इतवार गया बेकार
उठाया सुबह का अख़बार
शुरू किया दिन का पहला
कारोबार !!
वही पुरानी खबरे
वही पुराना
शोर ,कुछ नया नहीं
ये जितने बेकार के
शोर शराबे होते
हैं , कुछ काम के
क्यों नहीं होते ??
क्यों नहीं कोइ किसान मरता हैं
हैं तो लोग सड़को पे
उतरते हैं !!
क्यों नहीं हंगामा होता हैं
क्यों सिर्फ तमाशा होता हैं
एक लेख छपता हैं
सिर्फ शब्दों में क्यों
कोइ किसान रह जाता
क्यों नहीं वो हक़ पाता ??
क्यों नहीं जब कोइ
इज़्ज़त तार-तार होती हैं
तो कोइ हंगामा होता
क्यों नहीं हवा दी जाती
उस आग को
जो सदियों से सीने में धधक रही हैं !!
क्यों हर बार
सबकुछ अच्छा न होते हुए भी
शब्द चुन के डाले जाते हैं
क्यों माप तोल के
अख़बार के पन्नो
पे स्याही डाली जाती हैं ??
क्यों नहीं सारे वाजिब मुद्दों पे
आवाज उठाये जाते हैं !!
क्यों रोज हजार नियम
बनाये हजार तोड़े जाते हैं
कोइ उफ़ तक नहीं करता
जब सारे आम
बेवजह लोग मारे जाते हैं
क्यों नहीं कोइ हंगामा वहां होता
जब कोइ सैनिक शहीद होता
क्यों नहीं कोइ पन्ना अख़बार का
उनकी शहादत के अपने कुछ शब्द
समर्पित करता
अगर खून में उबाल नहीं
क्रांति करने का, तो
ये दिखावे का हंगामा क्यों ??
जब कोइ माँ
सारी उम्र लगा के
बच्चो को पालती हैं
उन्हें दुलार प्यार देती हैं
उनको वृद्ध - आश्रम भेजते
वक़्त कोइ बिरोध नहीं
होता,
कोइ हंगामा नहीं होता
तो फिर ये ,
झूठे दावे का हंगामा क्यों
जब समाज में परिवर्तन के
लिए हंगामा नहीं होता तो
फिर ये ठन्डे खून के लिए हंगामा क्यों ??
जाती के लिए हंगामा होता हैं
अखबार के पन्ने भर जाते हैं
फिर इंसानियत के
लिए कोइ जुलुश क्यों नहीं निकलता
हिन्दू के लिए निकलता हैं ,
मुस्लमान के लिए
निकलता ,
हिंदुस्तान के लिए
कोइ जुलुश क्यों नहीं निकलता
क्यों ये पुरानी
रीती रिवाजो के लिए
अख़बार के पन्ने भरते हैं
क्यों पेड़ो को काट के
इन बेकार के
कामो में अपना शब्द जाया करते हैं !!
थोड़ा पुकारो खुद को
एक आवाज आये शयद
कोइ नया जन्मे
कोइ नया कुछ कर जाये शायद
कुछ नया छपे इन पुराने
रद्दी के पन्नो में
एक नया किरदार निकल के आये शायद
जरा खुद को सम्भालो
नहीं तो ,
सिर्फ जुलुश होगी
लाशे होंगी
नंगे बदन पे
कही कोइ दाग रह जायेगा
आज तो सोमवार हैं
सुकून से थोड़ा जीने को
कल न देश रहेगा
न देशवासी
जहाँ सबकुछ
बिक रहा हैं
वहां सोमवार भी बलि चढ़ जायेगा !!
फिर इतवार की छुट्टी का न कोइ सुकून होगा
बस दहसत होगी
और दहसतो के खबर से
पूरा पन्ना फिर से अखबारों एक भर जायेगा !!
थोड़ा सफाई करो
अपनी आस - पास की
थोड़ी अपनी विचार की
शायद यही वजह बन जाये
जीने की ,
जीना सीखने की
इस्वर और खुदा सबमे बस्ता हैं
सिर्फ जरुरत हैं
सबकुछ भुला के
इंसान में इंसान देखने वाले इंसान की !!
फिर वही सोमवार
मैं थकी हुई सी
न सोई न जगी
सारा इतवार गया बेकार
उठाया सुबह का अख़बार
शुरू किया दिन का पहला
कारोबार !!
वही पुरानी खबरे
वही पुराना
शोर ,कुछ नया नहीं
ये जितने बेकार के
शोर शराबे होते
हैं , कुछ काम के
क्यों नहीं होते ??
क्यों नहीं कोइ किसान मरता हैं
हैं तो लोग सड़को पे
उतरते हैं !!
क्यों नहीं हंगामा होता हैं
क्यों सिर्फ तमाशा होता हैं
एक लेख छपता हैं
सिर्फ शब्दों में क्यों
कोइ किसान रह जाता
क्यों नहीं वो हक़ पाता ??
क्यों नहीं जब कोइ
इज़्ज़त तार-तार होती हैं
तो कोइ हंगामा होता
क्यों नहीं हवा दी जाती
उस आग को
जो सदियों से सीने में धधक रही हैं !!
क्यों हर बार
सबकुछ अच्छा न होते हुए भी
शब्द चुन के डाले जाते हैं
क्यों माप तोल के
अख़बार के पन्नो
पे स्याही डाली जाती हैं ??
क्यों नहीं सारे वाजिब मुद्दों पे
आवाज उठाये जाते हैं !!
क्यों रोज हजार नियम
बनाये हजार तोड़े जाते हैं
कोइ उफ़ तक नहीं करता
जब सारे आम
बेवजह लोग मारे जाते हैं
क्यों नहीं कोइ हंगामा वहां होता
जब कोइ सैनिक शहीद होता
क्यों नहीं कोइ पन्ना अख़बार का
उनकी शहादत के अपने कुछ शब्द
समर्पित करता
अगर खून में उबाल नहीं
क्रांति करने का, तो
ये दिखावे का हंगामा क्यों ??
जब कोइ माँ
सारी उम्र लगा के
बच्चो को पालती हैं
उन्हें दुलार प्यार देती हैं
उनको वृद्ध - आश्रम भेजते
वक़्त कोइ बिरोध नहीं
होता,
कोइ हंगामा नहीं होता
तो फिर ये ,
झूठे दावे का हंगामा क्यों
जब समाज में परिवर्तन के
लिए हंगामा नहीं होता तो
फिर ये ठन्डे खून के लिए हंगामा क्यों ??
जाती के लिए हंगामा होता हैं
अखबार के पन्ने भर जाते हैं
फिर इंसानियत के
लिए कोइ जुलुश क्यों नहीं निकलता
हिन्दू के लिए निकलता हैं ,
मुस्लमान के लिए
निकलता ,
हिंदुस्तान के लिए
कोइ जुलुश क्यों नहीं निकलता
क्यों ये पुरानी
रीती रिवाजो के लिए
अख़बार के पन्ने भरते हैं
क्यों पेड़ो को काट के
इन बेकार के
कामो में अपना शब्द जाया करते हैं !!
थोड़ा पुकारो खुद को
एक आवाज आये शयद
कोइ नया जन्मे
कोइ नया कुछ कर जाये शायद
कुछ नया छपे इन पुराने
रद्दी के पन्नो में
एक नया किरदार निकल के आये शायद
जरा खुद को सम्भालो
नहीं तो ,
सिर्फ जुलुश होगी
लाशे होंगी
नंगे बदन पे
कही कोइ दाग रह जायेगा
आज तो सोमवार हैं
सुकून से थोड़ा जीने को
कल न देश रहेगा
न देशवासी
जहाँ सबकुछ
बिक रहा हैं
वहां सोमवार भी बलि चढ़ जायेगा !!
फिर इतवार की छुट्टी का न कोइ सुकून होगा
बस दहसत होगी
और दहसतो के खबर से
पूरा पन्ना फिर से अखबारों एक भर जायेगा !!
थोड़ा सफाई करो
अपनी आस - पास की
थोड़ी अपनी विचार की
शायद यही वजह बन जाये
जीने की ,
जीना सीखने की
इस्वर और खुदा सबमे बस्ता हैं
सिर्फ जरुरत हैं
सबकुछ भुला के
इंसान में इंसान देखने वाले इंसान की !!
Too good
ReplyDeletethank you g :)
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