रिस्ता

खंजर की तरह चुभे थे वो शब्द जब उसने कहा था | उसका मेरे परिवार से कोइ रिस्ता नहीं हैं |
उसे परिवार का मतलब भी नहीं पता उसने रिस्ता तोड़ दिया ||
उसने उस माँ का अपमान किया जिसने उसकी कमिया छुपा दी |
उसने उस बहन का अपमान किया जिसने उस से जायदा किसी को माना  ही नहीं |
एक अंधेर दिए ने सब कुछ बुझा दिया ||
आये दिन उसके ताने चुभते थे और जो अपना था जिस से वो सारी  बातें कह सकती थी उसने भी सारे रिश्ते तोड़ दिए ||
अब वो क्या करती  कहाँ जाती उसने खुद को बंद कर लिया और अब शिकायत भी किस से करे जिस से कर सकते थे उस ने कभी सुना नहीं |
अब न शिकायते हैं न ताने  हैं ||
मरना भी होगा तो सुकून से
कमसे कम कोइ दाने देखर उसका हिसाब तो न लगाएगा ||
कोइ ये तो न कहेगा खुद की रोटियां खुद ही सेक लो ||

प्रिया मिश्रा :) 

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